पांच मासूमों की मौत, सूखे हैंडपंप और जर्जर आंगनबाड़ी… क्या इसी को विकास कहते हैं?

नंदनी कुमान के बैगा आदिवासियों की दर्दनाक जिंदगी: सरकारी योजनाओं के दावों के बीच बचपन आज भी बदहाली के साये में

कबीरधाम। किसी मां के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसकी गोद में खेलने वाला बच्चा अचानक दुनिया छोड़ जाए। किसी पिता के लिए इससे बड़ी बेबसी क्या होगी कि उसका बच्चा बीमार पड़े, लेकिन गरीबी, अभाव और जागरूकता की कमी के बीच वह समय पर बेहतर इलाज तक न पहुंच सके। और किसी समाज के लिए इससे बड़ा सवाल क्या होगा कि एक गांव में कुछ ही महीनों के भीतर पांच बच्चों की मौत हो जाए, लेकिन उनकी मौत के कारणों का स्पष्ट जवाब आज भी सामने न आए।

यह दर्दनाक तस्वीर कबीरधाम जिले के वनांचल क्षेत्र में बसे नंदनी कुमान गांव की है। यहां विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति के परिवार रहते हैं, जिन्हें अक्सर राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहकर संबोधित किया जाता है। लेकिन इन परिवारों की जिंदगी की हकीकत सरकारी दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां गरीबी है, बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, बच्चों के भविष्य पर संकट है और उन सवालों का ढेर है, जिनका जवाब जिम्मेदार व्यवस्था को देना चाहिए।

पांच बच्चों की मौत, लेकिन आखिर जिम्मेदार कौन?

बीते कुछ महीनों में गांव के पांच बच्चों की अलग-अलग परिस्थितियों में मौत होने की जानकारी सामने आई है। हर मौत के पीछे एक परिवार का उजड़ना, एक मां की सूनी गोद और एक ऐसे भविष्य का खत्म होना है, जो अभी दुनिया को ठीक से जान भी नहीं पाया था।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि इन बच्चों की मौत आखिर किन कारणों से हुई? क्या समय पर इलाज मिलता तो कुछ जिंदगियां बचाई जा सकती थीं? क्या कुपोषण, बीमारी, पोषण की कमी या स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का अभाव इसके पीछे कोई भूमिका निभा रहा था? इन सवालों का जवाब बिना चिकित्सकीय जांच और तथ्यों के नहीं दिया जा सकता। लेकिन पांच बच्चों की मौत के बाद भी कारणों को लेकर स्पष्टता का अभाव अपने आप में स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।

ग्रामीणों से जानकारी मिलने और मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव पहुंची। स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान आंगनबाड़ी से जुड़े 15 कमजोर और कुपोषित बच्चों को बोड़ला के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया गया है।

यह कदम बच्चों के उपचार के लिहाज से जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि जब बच्चे गंभीर रूप से कमजोर हो रहे थे, तब नियमित निगरानी और समय पर हस्तक्षेप क्यों नहीं हो पाया? क्या बच्चों के वजन, पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति पर पहले से नजर रखी जा रही थी? और यदि रखी जा रही थी, तो समस्या इतनी गंभीर होने तक कैसे पहुंच गई?

आंगनबाड़ी की इमारत है, लेकिन बच्चों के भविष्य की सुरक्षा कहां?

नंदनी कुमान की आंगनबाड़ी की हालत गांव की बदहाली की कहानी बयां करती है। भवन मौजूद है, लेकिन उसकी जर्जर स्थिति देखकर ही डर लगता है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस भवन में आने वाले नन्हे बच्चों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है? क्या यहां बच्चों को सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त पोषण और शुरुआती शिक्षा देने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध हैं?

आंगनबाड़ी केवल एक सरकारी इमारत नहीं होती। यह बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य की निगरानी और उनके शुरुआती विकास का महत्वपूर्ण केंद्र होती है। लेकिन जब भवन ही असुरक्षित हो और संसाधनों का अभाव हो, तो योजनाओं का वास्तविक लाभ बच्चों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एक ओर सरकार कुपोषण से मुक्ति और बच्चों के बेहतर भविष्य की बात करती है, दूसरी ओर इस गांव की तस्वीर पूछती है कि इन वादों का लाभ आखिर पहुंच कहां रहा है?

दो सोलर पंप, लेकिन पानी की एक बूंद नहीं!

गांव में दो सोलर पंप लगाए गए हैं, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक दोनों बंद पड़े हैं और उनसे पानी नहीं मिल रहा। नल और हैंडपंप भी सूखे पड़े होने की बात सामने आई है। यानी पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

पानी केवल प्यास बुझाने की जरूरत नहीं, बल्कि बच्चों की स्वच्छता, परिवारों के स्वास्थ्य और संक्रमण से बचाव का भी आधार है। ऐसे में जब गांव में पानी की नियमित व्यवस्था ही नहीं है, तो बच्चों और महिलाओं के सामने आने वाली कठिनाइयों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

यहां रहने वाले कई परिवार खेती और मजदूरी पर निर्भर हैं। कुछ के पास खेती के लिए पर्याप्त जमीन तक नहीं है। सीमित आय और कठिन परिस्थितियों के बीच परिवारों के लिए भोजन, पोषण, इलाज और बच्चों की देखभाल का खर्च उठाना आसान नहीं होता।

यह गरीबी केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है। यह उस मां की चिंता है, जो अपने बच्चे को पौष्टिक भोजन नहीं दे पाने से परेशान है। यह उस पिता की मजबूरी है, जो मजदूरी पर जाए या बीमार बच्चे को अस्पताल ले जाए—इस दोराहे पर खड़ा है।

बीमारी के बीच बेबसी, इलाज के बजाय झाड़-फूंक का सहारा

ग्रामीणों की परिस्थितियों के बीच एक और गंभीर पहलू सामने आता है। जानकारी के मुताबिक, कई बार बच्चे की तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे अस्पताल तक नहीं ले जा पाते, तो कुछ मामलों में झाड़-फूंक का सहारा लिया जाता है।

इसके पीछे केवल जागरूकता की कमी को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। दुर्गम इलाके, परिवहन की कठिनाई, गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और समय पर चिकित्सकीय सलाह न मिलना भी परिवारों की बेबसी बढ़ा सकते हैं। इन पहलुओं की वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है।

लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि परिवारों को बीमारी के शुरुआती लक्षण पहचानने, समय पर अस्पताल पहुंचने और बच्चों के पोषण की देखभाल के बारे में नियमित जानकारी मिले। स्वास्थ्य सेवाएं तभी प्रभावी होंगी, जब वे केवल किसी घटना के बाद गांव तक न पहुंचें, बल्कि जरूरत पड़ने से पहले ही परिवारों के साथ खड़ी हों।

मौत के बाद जागता तंत्र, छह महीने बाद पहुंचती है जानकारी?

इस मामले में सबसे चिंताजनक सवालों में एक यह भी है कि बच्चों की मौत की जानकारी अस्पताल और संबंधित संस्थानों तक कथित तौर पर महीनों बाद पहुंचती है। यदि ऐसा है, तो यह केवल सूचना के आदान-प्रदान की कमी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य निगरानी की गंभीर समस्या हो सकती है।

बच्चे की मौत होने पर उसकी सूचना समय पर स्वास्थ्य विभाग तक क्यों नहीं पहुंची? क्या प्रत्येक मृत्यु का रिकॉर्ड तैयार हुआ? क्या मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जरूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया अपनाई गई? क्या आशा कार्यकर्ता, मितानिन, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और स्वास्थ्य अमले के बीच समन्वय था?

इन सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी बच्चे की मौत को केवल एक आंकड़ा बनाकर दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है। हर मौत की परिस्थितियों को समझना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।

सरकार के दावे बनाम गांव की हकीकत

आदिवासी बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए कई योजनाएं संचालित हैं। फिर भी नंदनी कुमान की तस्वीर इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती है। यदि आंगनबाड़ी भवन जर्जर है, पेयजल व्यवस्था बंद है, बच्चों में कुपोषण सामने आ रहा है और मौतों की जानकारी समय पर दर्ज नहीं हो रही, तो केवल योजनाओं की सूची गिनाने से जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती।

योजनाओं का असली मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उनका लाभ सबसे जरूरतमंद परिवार तक पहुंचा या नहीं। गांव में भवन बना देना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उस भवन को सुरक्षित रखना, वहां संसाधन उपलब्ध कराना और बच्चों को नियमित सेवाएं देना भी उतना ही जरूरी है। सोलर पंप लगा देना विकास नहीं, उससे पानी मिलना विकास है। कुपोषण मिटाने की घोषणा नहीं, बच्चे का स्वस्थ होना उस घोषणा की असली सफलता है।

बैगा समाज ने उठाए सवाल, विपक्ष ने भी सरकार को घेरा

मामला सामने आने के बाद बैगा आदिवासी समाज के नेता ने सरकार पर विशेष पिछड़ी जनजाति की अनदेखी करने और योजनाओं का लाभ धरातल तक नहीं पहुंचने देने के आरोप लगाए हैं। विपक्ष ने भी इस मामले में सत्ता पक्ष को घेरते हुए सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि घटना सामने आने के बाद भी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि प्रभावित बैगा परिवारों का हाल जानने नहीं पहुंचे।

इन आरोपों पर संबंधित जनप्रतिनिधियों और प्रशासन का पक्ष भी सामने आना चाहिए, ताकि पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट हो सके। वहीं स्वास्थ्य विभाग ने घटना के बाद गांव में शिविर लगाकर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया और कमजोर बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले का समाधान केवल एक स्वास्थ्य शिविर तक सीमित रहेगा? क्या गांव की पेयजल व्यवस्था सुधरेगी? क्या आंगनबाड़ी भवन की मरम्मत होगी? क्या प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य और पोषण की नियमित निगरानी की जाएगी? और क्या पांचों बच्चों की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए अलग-अलग जांच होगी?

आखिर कब बदलेगी नंदनी कुमान की तस्वीर?

नंदनी कुमान की कहानी केवल एक गांव की बदहाली का विवरण नहीं है। यह उन मासूमों की कहानी है, जिनके पास अपने अधिकार मांगने के लिए शब्द नहीं हैं। यह उन माता-पिताओं की बेबसी है, जो सीमित साधनों के बीच अपने बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने का सपना देखते हैं। यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जो अक्सर किसी बड़ी घटना के बाद सक्रिय दिखाई देती है।

इन बच्चों का दोष क्या था? क्या उनका जन्म एक दूरस्थ वनांचल गांव में हुआ, इसलिए उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पानी, सुरक्षित आंगनबाड़ी और समय पर इलाज के लिए संघर्ष करना पड़े? क्या गरीबी के कारण उनके जीवन की कीमत कम हो जाती है? बिल्कुल नहीं।

हर बच्चे को सुरक्षित बचपन, पर्याप्त पोषण, इलाज और शिक्षा पाने का अधिकार है। बैगा जनजाति के बच्चों को भी वही अधिकार मिलने चाहिए, जो देश के किसी दूसरे हिस्से में रहने वाले बच्चों को मिलते हैं।

अब जरूरत केवल आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की है। पांच बच्चों की मौत की परिस्थितियों की जांच हो, गांव में पेयजल व्यवस्था बहाल की जाए, आंगनबाड़ी भवन को सुरक्षित बनाया जाए, कुपोषित बच्चों का नियमित उपचार हो और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जाए।

क्योंकि विकास का असली चेहरा चमकते मंचों और सरकारी घोषणाओं में नहीं, बल्कि उस गांव में दिखाई देता है जहां एक मां अपने बच्चे को स्वस्थ देखने की उम्मीद करती है। नंदनी कुमान के बैगा परिवार आज भी इसी उम्मीद के सहारे जी रहे हैं। सवाल सिर्फ इतना है—क्या उनकी उम्मीद को हकीकत में बदलने के लिए व्यवस्था अब जागेगी, या फिर किसी अगली दर्दनाक घटना के बाद एक बार फिर गांव में शिविर लगाकर जिम्मेदारियां पूरी मान ली जाएंगी?

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