छत्तीसगढ़ राज्योत्सव रजत जयंती समारोह के दूसरे दिन की संध्या छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत और लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर रही। जिला मुख्यालय कवर्धा स्थित आचार्य पंथ श्री गृथमुनि नाम साहेब शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मैदान में आयोजित इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रसिद्ध गायक अनुराग शर्मा ने अपनी मधुर और ऊर्जावान प्रस्तुति से दर्शकों का दिल जीत लिया।
उनकी एक के बाद एक सुरीली प्रस्तुतियों — “गीत कोनों गांहू गोरी”, “तोर सुरता मा”, “मेरा भोला है भंडारी” और “जय जय जय बजरंगबली” — ने पूरे मैदान को संगीतमय कर दिया। उनकी आवाज़ में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की महक और लोक धुनों की मिठास झलक रही थी। जैसे ही श्री शर्मा ने अपने प्रसिद्ध गीतों की श्रृंखला शुरू की, दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट और मोबाइल की रोशनी के साथ झूम उठे। देर रात तक वातावरण में संगीत की गूंज बनी रही।

राज्योत्सव की इस संध्या में छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के साथ हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों की भी सुंदर प्रस्तुति दी गई। अनुराग शर्मा की गायकी ने लोकसंगीत की आत्मा को आधुनिक संगीत के साथ जोड़ते हुए एक अनोखा संगम प्रस्तुत किया।
🎶 लोक संस्कृति का उत्सवमय रंग
पारंपरिक बांसगीत की प्रस्तुति
राज्योत्सव के मंच पर यादव समाज के कलाकारों ने दुर्लभ पारंपरिक बांसगीत “जय बाबा भोरमदेव बास गीत” की जीवंत प्रस्तुति दी। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की संगत में प्रस्तुत इस गीत ने दर्शकों को पीढ़ियों से चले आ रहे लोककला रूप से परिचित कराया।
नरसिंह अवतार की नृत्यनाटिका
कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की छात्राओं ने नरसिंह अवतार पर आधारित नृत्यनाटिका प्रस्तुत की, जिसने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। भगवान विष्णु के इस अवतार की कथा को छात्राओं ने संगीत और अभिनय के साथ सजीव रूप में मंचित किया।
“पियर पियर तोर जावरा” से गूंजा भक्ति का रंग
बोड़ला के लोक कलाकार चुम्मन साहू ने जस गीत “पियर पियर तोर जावरा” और गौरा-गौरी गीत प्रस्तुत कर मंच को भक्ति और लोक रंग से भर दिया। गीतों की लय और भाव ने पूरे परिसर को श्रद्धा और आस्था के वातावरण में डुबो दिया।
सरगम टीचर्स ग्रुप ने जगाया संगीत का जुनून
महेश सिंह ठाकुर एवं सरगम टीचर्स ग्रुप ने “मेरी जिंदगानी है मेरी महबूबा” और “जाने जा ढूंढता फिर रहा” जैसे फिल्मी गीतों से समां बांध दिया। उनकी मधुर आवाज़ ने दर्शकों को उस स्वर्णिम दौर की याद दिला दी जब गीत सिर्फ सुने नहीं, बल्कि महसूस किए जाते थे।
राज्योत्सव की यह संगीतमय संध्या छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, परंपरा और आधुनिकता के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। कवर्धा की यह रात संगीत, नृत्य और संस्कृति के रंगों में डूबी रही, जिसने एक बार फिर यह साबित किया कि छत्तीसगढ़ केवल “धान का कटोरा” ही नहीं, बल्कि संगीत और संस्कृति की भी समृद्ध भूमि है।


